Tubelight Wala Jugnu || by Sahil Kumar- इस कविता का शीर्षक ‘Tubelight Wala Jugnu’ है ,इसे Sahil Kumar के द्वारा लिखा गया है और प्रस्तुत भी किया गया है ।
अपने हाथो को उठाकर
जब तुम नाच रहे थे बारात में
ट्युबलाइट और झूमरो से चमचमाती उस रात में
जब तुम बेअदब होकर पैसे उड़ा रहे थे
मैने जिम्मेदारी उठा रखी थी,अपने हाथ में
जलते ट्युबलाइट के साथ मेरा बचपन अंधेरे मे पल रहा है
हाँ ये वही शख्स है,जो दुल्हे के रथ के बगल में चल रहा है
चप्पल टूटी है,पहनावा थोड़ा सादा है
दिहाड़ी कम है पर बोझ ज्यादा है
दो सौ के नोटो की माला देख
मै थोड़ा हक्का बक्का हुँ
बजाय मक्कारी के मेहनत करता हुँ
क्योकि मैं ईमान का पक्का हुँ
जो मुझको भा गयी
वो सहबाले की शेरवानी है
मैं भी वहाँ होता,पर मेरी तो अलग ही कहानी है
अभी अभी चिंटू को जनरेटर से चार झटके आये है
पर वो कुछ भी नही उसके सामने,जो हमने जिंदगी से खाये है
जिंदगी के पहले झटके में अब्बू गये,दूसरे में गया मेरा बचपन
और दिहाड़ी कितनी है मेरी?
कभी साठ तो कभी पचपन
चलो मान ले कि पचपन और साठ में जिंदगी का हिसाब हो जाये
पर क्या हो अगर ट्युब्लाइट खराब हो जाये
तुम्हे मुफ्त में जगकर ट्युबलाइट उठाकर चलना है
दूसरो की खुशियो में शामिल होके उनसे जलना है
मुझपे कोई ध्यान भी नही देता
क्योकि ये दुनिया रंगो की दीवानी है
और मेरा रंग तो जैसे पानी है
भले ही मै तुम्हारी खुशियो का हिस्सा नही हुँ
मैं खुद एक अफसाना हुँ,कोई किस्सा नही हुँ
मैं ट्युबलाइट वाला कोई जुगनू नही ,एक परिंदा हुँ
मेरे दिल मे उम्मीद कायम है इसलिये मैं जिंदा हुँ
बस कमी है उस मोड़ की जहाँ से मुझे भी मुड़ जाना है
मैने सोच रखा है पंखो के लगते ही उड़ जाना है
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