KANHA VO TUMHARI GAJAL SE NIKL JAEGI-कान्हा वो तुम्हारी गजल से निकल जायेगी- kanha kamboj

Poetry Details:-

KANHA VO TUMHARI GAJAL SE NIKL JAEGI-कान्हा वो तुम्हारी गजल से निकल जायेगी-गजल को kanha kamboj ने लिखा और प्रस्तुत किया है,ये गजल Alfaaz Dil ke यु ट्युब चैनल पर प्रदर्शित किया गया है।

किसी गली, किसी शहर मे रहो,
किसी बेखबर ने कहा मगर खबर मे रहो
मेरा ख्वाव टूट गया ख्वाव आसमानी देखकर
मेरी नजर ने कहा अपनी हदे नजर मे रहो
बरसो से वीरान पड़ा है तो सलाह है तुम्हे
बनाओ इसमे आशियाँ दिल के घर मे रहो
वो तुम्हारी गजल से निकल जायेगी ‘कान्हा’
आशार लिखते हुये थोड़ा सबर मे रहो


जंगल से एक सजर काट रहा हु मै
यानि किसी का घर काट रहा हु मै
आइने मे दर्ज करता रहा हरकते अपनी
ये रात खुद से मिल कर काट रहा हु मै
मेरा चेहरा बता रहा था गुमानियत मेरी
किसी बेहरे ने कहा बात काट रहा हु मै
अपनी पेहचान थोडी पर्दे मे रखो कान्हा
लिखकर ये पूरी गजल काट रहा हु मै


मेरी गमो मे मेरी हिस्सेदार नही लगती
ये लड़की मेरी कहानी का किरदार नही लगती
उसकी फिक्र करु तो हुकुमत बताती है
यार ये लड़की मुझे समझदार नही लगती
है जानना क्या बताती है अपने घर मुझे
मगर मेरे घर से उसके घर की दीवार नही लगती
मै हकीकत जानता हुँ फिर भी छुपाती है बातें
मुँह पर झूठ बोलती है,यार ईमानदार नही लगती
झुकना पड़ता है उसकी गल्ती के आगे मुझे
गुनाह इतनी चालाकी से करती है गुनहगार नही लगती
फिजुल ही पढ रहे हो उसके हक मे कलाम ‘कान्हा’
तुम्हारी इन दुआओ की वो जरा भी हकदार नही लगती


तु जरुरी है हर जरुरत को आजमाने के बाद
तू चलाना मर्जी अपनी मेरे मर जाने के बाद
है सितम ये भी के हम उसे भी चाहते है
वो भी इतना सितम ढाने के बाद
उसे रास्ते मे देखा तो मुस्कुरा दिया देखकर
बहुत रोया मगर घर जाने के बाद
मुझसे मिलने आओगी ये वादा करो
मुलाकात रकीब से हो जाने के बाद
वैसे हो बड़े बदतमीज तुम ‘कान्हा’
किसी ने कहा अपनी हद से गुजर जाने के बाद

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