इस भावपूर्ण और ओजस्वी वीर रस कविता में सुनिए श्रीराम के परम भक्त, महाबली बाली पुत्र अंगद की अद्भुत वीरता, बुद्धिमत्ता और अटूट रामभक्ति की गाथा।
जब प्रभु श्रीराम ने अंगद को शांति का संदेश लेकर लंका भेजा, तब अंगद ने रावण की भरी राजसभा में निर्भीक होकर धर्म, मर्यादा और सत्य का संदेश दिया।
तो घर-गांव-गांव राम धुन चल रही, दुष्ट दानवों को राम मति मिलने लगी।
आहा! क्या हुआ? राम का नाम घर-घर पहुंच गया।
एक कविता मैंने अंगद पे लिखी है। वो सुनाना चाहता हूं। सात मिनट की कविता मेरा काम हो जाएगा।
घर-घर गांव-गांव राम धुन चल रही।
दुष्ट दानवों को राम मति मिलने लगी।
राम जी की चाह में हमारी चाह घुल गई।
राम जी के काज को भी गति मिलने लगी।
और बरसों से सो रहे, जो पाप की रजाई ओढ़े ऐसे,
कुंभकरणों की नींद खुलने लगी।
और पांव अंगद का जो जमने लगा है,
प्रभु रावणों से शासकों की नींव हिलने लगी।
पांव अंगद का जो जमने लगा है।
श्री राम की आज्ञा पाकर के लंका पहुंचा बाली सपूत,
कथानक सबको मालूम है, शांतिदूत।
अंगद की कविता है। अंगद कैसे शांति का प्रस्ताव रखता है, आपको पता है। मैं कविता पाठ कर रहा हूं।
श्री राम की आज्ञा पाकर के लंका पहुंचा बाली सपूत,
शांति ध्येय मन में रखकर लंका पहुंचा श्रीराम दूत।
हाथी सा बल था अंगद में, हिमगिरि सा जिसका सीना था।
सुग्रीव की सेना में अंगद जैसे कोई चमकता नगीना था।
बुद्धि थी उसकी बड़ी प्रखर, जिसका यश फैला था नभ में।
देवराज इंद्र का नाती, खौलता रक्त था रग-रग में।
उसकी आंखों की चमक देख दिनकर भी उससे जलता था।
मिट्टी भी छन-छन जाती थी, ऐसे बलशाली चलता था।
श्री हरि भजन करते-करते लंका की लोकसभा पहुंचा।
रावण था मंत्री जिसमें, लंका की राज्यसभा पहुंचा।
भयभीत हुआ रावण विस्मय, अंगद को जब सम्मुख देखा।
बाली जैसा ही तेज लिए, बाली जैसा ही मुख देखा।
रावण बोला तब अंगद से,
तुम कौन, कहां से आए हो?
वानर, तुमको क्या कहना है?
क्या संदेशा तुम लाए हो?
अंगद बोला, अंगद बोला,
लंकेश सुनो, ये नियम नहीं भूपतियों का।
सम्मान मानना जान सके, ये है स्वभाव पशुवर्तियों का।
है नियम यही, पहले आसन हो,
तभी सहज संवाद रहे।
सबसे पहले व्यवहार कुशल,
फिर तर्क-वितर्क के बाद रहे।
अटहास किया, बोला रावण,
मूर्ख! तू कुछ जानता नहीं।
जो जंगल-जंगल फिरता हो,
मैं उसे नरेश मानता नहीं।
अंगद बोला, सच है,
तुमको अंदाजा कैसे हो सकता?
जो सृष्टि का निर्माता है,
वो राजा कैसे हो सकता?
वो मर्यादा का शिखर पुरुष,
सूरज जिससे दमक रहा।
जिसके चेहरे की आभा से,
चंदा रातों में चमक रहा।
ब्रह्मा, विष्णु, आशुतोष सब,
जिसके ही तो अंदर हैं।
जिसकी आज्ञा से ही चलते,
सब दरिया और समंदर हैं।
वायु, जल, धरती, ज्वाला,
जिसके ये सभी खिलौने हैं।
सृष्टि का सृजन-विलय सब कुछ,
जिनके हाथों से होने हैं।
जो तीनों लोक का स्वामी है,
सारा बैकुंठ उन्हीं का है।
वो रामचंद्र त्रिलोकपति हैं,
ये अंगद दूत उन्हीं का है।
क्या बात है भाई! वाह!
रावण बोला,
ये खोखल है, सच्चा तेरा यह कथन नहीं।
वो वनवासी वन में फिरता,
बाकी कुछ भी तो सत्य नहीं।
अपमान सुना श्री चरणों का,
अंगद ज्वाला सा दमक उठा।
सीने में पावक चमक उठी,
गुस्से से अंगद तमक उठा।
अंगद बोला,
प्रभु का अपमान नहीं सह सकता मैं।
जिस जगह अनीति-अनाचार हो,
उस जगह नहीं रह सकता मैं।
पर जो संदेशा मैं लाया हूं,
लंका का वक्त टिका है जिस पे।
जिसमें तेरा कल्याण निहित,
लंका का रक्त टिका है जिस पे।
विचार किया मन में अंगद और
कर्तव्य अजब दिखाया।
पूंछ बढ़ाई ऐसी कि ऊंचा
आसन बनाया।
आसन ऊंचा सिंहासन से,
रावण भी जिससे ऐंठ गया।
इधर युवा अंगद आसन पर,
स्वाभिमान से बैठ गया।
तारासुत अंगद बोला फिर,
अब बात तुम्हें बतलाता हूं।
तुम सखा पिता के मेरे हो,
इसलिए तुम्हें समझाता हूं।
जो युद्ध में पारंगत,
मैं पुत्र उन्हीं बाली का हूं।
जिसने संगारा दुंधुभि को,
मैं पुत्र उन्हीं बाली का हूं।
मैं उस महाबली का पुत्र हूं,
जिसने मायावी निशाचर मारा।
जिसके सम्मुख हर योद्धा ने,
अपने बल को पल में हारा।
तात बालि का पुत्र मैं अंगद,
रामदूत हूं लंकेश्वर।
माता मेरी तारा है,
श्री रामचंद्र मेरे ईष्ट।
क्या बात है भाई! वाह! वाह!
अंगद बोला तब रावण से,
तुम पंडित हो, महाज्ञानी हो।
पर मेरी समझ नहीं आता,
फिर करते क्यों नादानी हो?
तुम लंकेश्वर, तुम लंकापति,
तुम ऋषि पुलस्त्य के नाती हो।
तुम आशुतोष के बड़े भक्त,
फिर भी निश्चित घाती हो।
तुम वीर बड़े हो, माना,
पर शक्ति का दुरुपयोग किया।
ऋषि-मुनियों को तुमने नोचा,
तुमने जग का अपभोग किया।
वो संतोष तुम्हारा या कुमति,
अभिमान किया?
जो वर लाए उस अहंकार में आकर,
मां सीता को तुम हर लाए।
अब पाप शिखर पर जा पहुंचे,
इसका हिसाब करना होगा।
लंका बजरंगी जला चुके,
अब तुमको मरना होगा।
इसलिए चुनो अब पथ ऐसा,
हे भक्त शंभू कैलाश का।
जिससे बच जाए लंका ये,
और भला हो लंका वासी का।
लंकेशपति, त्यागो अहंकार,
प्रभु के चरणों में आ जाओ।
मां जननी को वापस कर दो,
बैकुंठ धाम को पा जाओ।
क्या बात है भाई! वाह! वाह! वाह! वाह!
रावण बोला,
करुणामय हैं।
अंगद ने कहा,
करुणा निधान हैं, माफ कर देंगे प्रभु।
रावण बोला,
करुणामय है सेना में जिसके बंदर हैं,
पर सत्य यही, वह डरता है।
कायरता उसके अंदर है।
कह देना अपने राम से तुम,
सूरमा संधि नहीं करता है।
वापस जाए साकेत कहो,
यदि मुझसे अब वो डरता है।
अंगद बोला,
जो हरता पर-नारी को,
सूरमा सिद्ध हो जाता क्या?
जो हर पल लड़ने की बात करे,
वो आखिर जग में पाता क्या?
कायर में हिम्मत ना होती,
जो शत्रु को कभी माफ करे।
तुम वीर कहे जाओगे क्या,
जो प्रतिशोध में लंका राख करे?
और लंकापति स्त्री-लोलुप कामी,
इतने कुछ शर्म करो।
जिससे मिल जाए तुम्हें मोक्ष,
ऐसा भी तो कुछ कर्म करो।
रावण, रावण, रावण कहते,
तुम रावण कहो कौन से हो?
मैंने कितने रावण ही सुने,
तुम रावण कहो कौन से हो?
पाताल लोक जब गमन हुआ,
जिसको बच्चों ने बांध लिया।
तब महाराज बलि के कहने पर,
उसको छुड़वाकर माफ किया।
एक रावण जिसका गुरूर,
सहस्रबाहु ने तोड़ दिया।
तब पुलस्त्य ऋषि के आग्रह पर,
उसको सकुशल छोड़ दिया।
तुम कहो कौन से रावण हो?
किस-किस से तुम तब डरते थे?
कहीं वो तो नहीं जिसे दादा काक में,
भजन तात मेरे करते थे।
क्या बात है भाई! वाह!
तुम कहो कौन से रावण हो?
किस-किस से तुम तब डरते थे?
कहीं वह तो नहीं जिसे दादा काक में,
भजन तात मेरे करते थे।
रावण बोला,
सावधान अंगद!
जो मन में फूले हो,
तुम खड़ी सभा में लंका की,
शायर इसको तुम भूले हो।
है कौन वीर और बलशाली,
अंगद तुमको बतलाता हूं।
तुम ठहरो, ठहरो अभी यहां,
तुमको शक्ति दिखलाता हूं।
अंगद बोला,
शक्ति का तो बस अभी पता चल जाएगा।
या तो लज्जा से शीश झुकेगा,
या फिर तू पछताएगा।
रामदूत अंगद का प्रण,
मैं वचन नहीं तोडूंगा।
अगर हिला दिया ये पांव मेरा,
तो सारी सेना मोडूंगा।
रघुपति भूलेंगे सीता को,
और विजय तुम्हारी होगी फिर।
लंका दशग्रीव तुम्हारी है,
ये सृष्टि सारी होगी फिर।
इतना कहकर के अंगद ने,
जलती ज्वाला को थमा दिया।
पत्थर जो जमे हिमालय पर,
ऐसे तब पांव जमा दिया।
क्या बात है! विश्वास अटल था राम भक्त का।
कोई मायावी शक्ति नहीं थी अंगद के पास,
राम का भरोसा था, राम संभालेंगे।
विश्वास अटल था राम भक्त का,
सृष्टि सारी मानी थी।
पांव हिला ना सकी लंका सेना,
सारी सेना पानी थी।
लंका के सारे योद्धा तब,
एक-एक कर धराशाई होते।
सभा सन्न रह गई,
झुके सिर सभी लज्जाई होते।
ना बचा कोई भी महाबली,
लंका की लाज बचाने को।
तब इंद्रजीत हो गया खड़ा,
बल अपना आजमाने को।
वो इंद्रजीत, वो मेघनाद,
जिसका भय फैला था नभ तक।
जिससे डरते थे देव-असुर,
खामोश सभा में था अब तक।
मेघनाद ने जोर लगाया,
फिर अपनी शक्ति को शीश चढ़ा।
अंगद का पांव जमा ऐसे,
हो सभा बीच कोई खंभा गड़ा।
एक तरफ बल इंद्रजीत का,
सामने राम की भक्ति थी।
विश्वास राम का अड़ा रहा,
भक्ति की अद्भुत शक्ति थी।
जब हार गया मेघनाद और
जब राज्यसभा के सभी असुर,
तब सिंहासन से खड़े हुए
लंकेश्वर दसग्रीव उठे निज आसन से।
अंगद मन में मुस्काता था,
रावण को देख खुशी से वो
जय राम बोलता जाता था।
कदम बढ़ाता रावण तब,
अंगद की ओर चला आया।
धरती कांपती पग धरने से,
ऐसी थी रावण की काया।
अंगद समझ गया,
विधना को करतब नया दिखाना है।
कुछ राजनीति, कुछ कूटनीति,
कुछ मर्म नया समझाना है।
जैसे ही रावण झुका,
पांव तब हटा।
मुकुट गिर गया धरा पर पल भर में।
हटाकर पांव उठाकर मुकुट,
बोलकर राम उछाला।
मुकुट गिरा राम दल में,
अंगद बोला था।
वाह! वाह!
अंगद बोला तब रावण से,
क्या पांव दूत के पड़ना है?
जा पकड़ हरि के चरण,
अन्यथा तुझको रण में मरना है।
ये दिनकर साक्षी होगा,
फिर दुख में सारी लंका होगी।
जब रामचंद्र का बाण चढ़ेगा,
निशाचर हीन धरा होगी।
इतना कहकर के अंगद ने,
श्री चरणों का आह्वान किया।
श्री राम उद्घोष किया,
लंका से प्रस्थान किया।
लंका संदेशा पहुंचा कर,
जय-जय श्री राम हुंकार उठा।
जन-जन, कण-कण, तृण-तृण,
हर क्षण जय-जय श्री राम पुकार उठा।
