TEHZEEB HAAFI @ DUBAI MUSHAIRA | 15TH NOV 2025 DUBAI

Poerty Details

इस पोस्ट मे कुछ मशहुर नग्मे और शायरियाँ पेश की गयी है जो कि Tehzeeb Hafi जी के द्वारा लिखी एवं प्रस्तुत की गयी है।

कभी सच में ऐसा हो जाता तुम कह कर मेरे घर आते।
झूठों का मुकाबला होता तो तुम पहले नंबर पर आते।
तेरे हाथों से किसी रोज मुझे आग लगे ऐसा सुलगूं के हवाओं की जरूरत ना पड़े
तूने चाहा जिसे वो इतना तुझे खुश रखे तुझको मेरी भी दुआओं की जरूरत ना पड़े

उससे मिलने का भी सोच रहा होता हूं। और दर पर कोई जंजीर लगा देता है।
जब भी सोचूं कि उसे मैंने भुला देना है। Facebook पर कोई तस्वीर लगा देता है।
तुझे भी खौफ था तेरी मुखालफत करूंगा मैं।
और अब अगर नहीं करूंगा तो गलत करूंगा मैं।
उसे कहो के अहदे तरके रस्मो राह लिख के
कलाई काट कर लहू से दस्तखत करूंगा मैं।

दिल को अब तुझसे जुदा होकर भी जीना आ गया।
इस झरोके में हवा का ताजा झोंका आ गया।
इन अंधेरों में पहुंच पाना बहुत दुश्वार था।
मैं तेरी आवाज पर पलकें झपकता आ गया।
एतरामन उंगलियों से होंठ गीले कर लिए।
जब मेरी दहलीज पे खुद बह के दरिया आ गया।
इस जहां में मेरे जैसा कोई बदकिस्मत भी है।
जिसने जो कुछ भी उतारा मुझको पूरा आ गया।
वो तो कहता था कि तुमसे अच्छे 100 मिल जाएंगे।
आज उसे इस हाल में देखा तो रोना आ गया।
मारने वाला था अपने आप को उस रोज मैं।
फिर मेरी आंखों के आगे उसका चेहरा आ गया।

ऐ खुदा तेरे जहानों के खजानों से बता सांस लेने के अलावा और क्या लेता हूं मैं।
क्या खबर वो देखने आ जाए कि कैसा हूं मैं। एहतियातन हिज्र में दाढ़ी बढ़ा लेता हूं मैं।

मैंने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक्त आने पे कर जाऊंगा।
तुम मुझे जहर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊंगा।
तू तो बीनाई है मेरी। तेरे इलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं।
मैंने तुझको अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊंगा?
क्या चाहता हूं तुम्हें और बहुत चाहता हूं तो मैं खुद भी मालूम है।
हां अगर मुझसे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुंह पे मुंह कर जाऊंगा।

घर में भी दिल नहीं लग रहा। काम पर भी नहीं जा रहा।
जाने क्या खौफ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा।
रात के 3:00 बजने को हैं यार यह कैसा महबूब है
जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा।

जिंदगी भर फूल ही भिजवाओगे। या किसी दिन खुद भी मिलने आओगे।
खुद को आईने में कम देखा करो। एक दिन सूरजमुखी बन जाओ।

नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा
किसी से मिलके बहुत देर बाद अच्छा लगा
तुम्हें लगा था मैं मर जाऊंगा तुम्हारे बगैर
बताओ फिर तुम्हें मेरा मजाक कैसा लगा

दिखाती है दिखाती है भरी अलमारियां बड़े दिल से बताती है
कि मोहब्बत में किसका कितना लगा भरम रखा है
तेरे हिज्र का वरना क्या होता है मैं रोने पे आ जाऊं
तो झरना क्या होता है?
मौत तो मेरी मुट्ठी में रहती है उसकी खातिर।
इससे भी आगे जा सकता हूं। मरना क्या होता है?
जिन पर वो आंखें उठी है उनसे जाकर पूछो। डूबना क्या होता है?
पार उतरना क्या होता है? मेरा छोड़ो। मैं नहीं थकता। मेरा काम यही है।
लेकिन तुमने इतने प्यार का करना क्या होता है?

कैसे उसने यह सब कुछ मुझसे छुपकर बदला।
चेहरा बदला, रास्ता बदला। बाद में घर बदला।
मैं उसके बारे में यह कहता था लोगों से
मेरा नाम बदल देना वो शख्स अगर बदला
वो भी खुश था उसने दिल देकर अगर दिल मांगा है
मैं भी खुश हूं। मैंने पत्थर से पत्थर बदला।
मैंने कहा क्या मेरी खातिर खुद को बदलोगे?
और फिर उसने नजरें बदली और नंबर बदला।

ज़हन से यादों के लश्कर जा चुके।
वो मेरी महफिल से उठकर जा चुके।
मेरा दिल भी जैसे पाकिस्तान है।
सब हुकूमत करके बाहर जा चुके।


जिर से बचने के मंत्र आ गए। हम तुम्हारे गम से बाहर आ गए।
मैंने तुमको अंदर आने का कहा। तुम तो मेरे दिल के अंदर आ गए।
एक ही औरत को दुनिया मान कर इतना घूमा हूं कि चक्कर आ गए।
मैं तुझे तन्हा समझता था मगर तेरे कहने पर तो लश्कर आ गए।

बहुत मजबूर होकर मैं तेरी आंखों से निकला। खुशी से कौन अपने मुल्क से बाहर रहा है?
गले मिलना ना मिलना तो तेरी मर्जी है। लेकिन तेरे चेहरे से लगता है तेरा दिल कर रहा है।

मोहब्बत में जो सुन रखा था वैसा कुछ नहीं होता
इसमें बंदा मर जाता है ज्यादा कुछ नहीं होता।
चलो माना कि मेरा दिल मेरे महबूब का घर है।
पर उसके पीछे उसके घर में क्या-क्या कुछ नहीं होता।
ये फिल्मों में ही सबको प्यार मिल जाता है आखिर में।
मगर सचमुच में इस दुनिया में ऐसा कुछ नहीं होता।
मेरी गुर्बत ने मुझसे मेरी दुनिया छीन लीफी।
मेरी अम्मा तो कहती थी कि पैसा कुछ नहीं होता।

तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है।मोहब्बत मोहब्बत बड़ा जानते हो।
तो फिर यह बताओ कि तुम उसकी आंखों के बारे में क्या जानते हो?
ये जग्राफिया, फलसफा, साइकोलॉजी, साइंस, रियाजी वगैरह
ये सब जानना भी अहम है। मगर उसके घर का पता जानते हो।

उसी जगह पर जहां कई रास्ते मिलेंगे। पलट के आए तो सबसे पहले तुझे मिलेंगे।
अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बु्जदिल भी पहली सफ में खड़े मिलेंगे।

रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ्तर खा जाता है।
दिल जीने पे मायल होता है तो मौत का डर खा जाता है।
सच पूछो तो तहजीब हाफी मैं ऐसे दोस्त से आज हूं।
मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है।

तेरा चुप रहना मेरे ज़हन में क्या बैठ गया
इतनी आवाजें तुझे दी कि गला बैठ गया
यूं नहीं है कि फकत मैं ही उसे चाहता हूं
जो भी उस पेड़ की छांव में गया बैठ गया बैठ गया
इतना मीठा था वो गुस्से भरा लहजा मत पूछ
उसने जिस जिस को भी जाने का कहा बैठ गया
बात दरियाओं की सूरज की ना तेरी है यहां।
दो कदम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया।
और उसकी मर्जी वो जिसे पास बिठा ले अपने
इस पे क्या लड़ना फला मेरी जगह बैठ गया।
अपना लड़ना भी मोहब्बत है। तुम्हें इल्म नहीं।
चीखती तुम रही और मेरा गला बैठ गया।
बज्म जाना में नशिस्ते नहीं होती मखसूस
जो भी एक बार जहां बैठ गया बैठ गया

जब से उसने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ
उसका कमरा एक तरफ है। बाकी दुनिया एक तरफ।
सबकी कहानी एक तरफ है। मेरा किस्सा एक तरफ।
एक तरफ सैराब हैं सारे और मैं प्यासा एक तरफ।
एक तरफ तुम्हें जल्दी है उसके दिल में घर करने की।
एक तरफ वो कर देता है रफ्ता रफ्ता एक तरफ।
मेरी मर्जी थी मैं लहरें चुनता या जर्रे चुनता
उसने दरिया एक तरफ रखा और सहरा एक तरफ
यूं तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन
तुझसे जुदा होने के बाद का पहला हफ्ता एक तरफ
तेरी आंखों ने मुझसे मेरी खुददारी छीनी वरना
पांव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ

गले तो लगना है उससे कहो अभी लग जाए।
यही ना हो मेरा उसके बगैर जी लग जाए।
मैं आ रहा हूं तेरे पास।
ये ना हो कि कहीं तेरा मजाक हो
और मेरी जिंदगी लग जाए।
हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से।
कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए।
पता करूंगा अंधेरे में किससे मिलता है
और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए।
क्लास रूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है।
हमारे होते तेरी गैर हाजिरी लग जाए।
मैं पिछले 20 बरस से तेरी गिरफ्त में हूं
कि इतनी देर में तो कोई आईजी लग जाए।

मैं जहां हूं वहां शोर ही शोर है। झूठ ही झूठ है।
एक दिखावे की दुनिया जहां कुछ किसी का भी अपना नहीं।
ख्वाब है तो खरीदे हुए, नींद है तो चुराई हुई,
आंख है तो मिलाई हुई, दिल किसी से लगाया हुआ
और कसम है तो खाई हुई।
हाथ है तो छुड़ाए हुए, अश्क हैं तो बहाए हुए,
लफज़ लिखकर मिटाए हुए, दिन भी है तो बिताया हुआ,
रात है तो गुजारी हुई। सबके दिल में
कोई एक तस्वीर है और वो भी किसी और के कैनवत से उतारी हुई।
हर तरफ नफरतें और जलन, अपने प्यारों से झूठे वचन।
दूसरों के खुदाओं का इंकार करने की झूठी लगन,
मंदिरों में अज़ान, मस्जिदों में भजन, खालीपन,
अपने सीनों में तुम इन धड़कते हुए पत्थरों को
अगर दिल कहो तो कहो पर मेरी माज़रत।
औरतें आरजू तो नहीं है कि तुम इनको पूरा करो।
औरतें आईना है। इन्हें देखकर ही तुम्हें
अपने अंदर के हैवान पहचानने में मदद मिल सके तो मिले।
होटलों के गलत बिस्तरों पर बदलती हुई चादरों में मोहब्बत के मानी ना ढूंढो।

तुमने सोचा जिन्हें छू के तुम छोड़ आए हो अब वो बदन क्या हुए।
अपने महबूब को तुमने खलवत में मिलने का सोचा तो ओयो किया।
हाथ उठाए तो कॉन्सर्ट में नाचने के लिए उंगलियां टेढ़ी की और यो यो किया।
सच्चे फनकार को गालियां मस्करों के लिए गंदी बातों पे बसीटियां तालियां।
रात भर आज की रात सुनते हो और वो तमन्ना है उसकी तमन्ना में अपने ना खो दो कहीं।
कुछ बरस पहले कांटा लगा था तुम्हें और बेरी के नीचे तुम्हें कुछ मिला
बुढ़ापा नहीं देखता कौन शीला जमा थी यहां यहां जिंदगी कोई सिनेमा नहीं
कि यहां जख्म होगा दुखेगा नहीं आदमी कोई पुष्पा है क्या जो झुकेगा नहीं
फिल्में है कोई फ्लॉप हो गई और कोई चली कौन शिवगामी देवी यहां कौन बाहुबली
हर बदलती हुई बीठ पर तुम थरकते रहे पांव थकते रहे
अब जब अपनी तरफ तुम सफर कर रहे हो तो तुमसे चला ही नहीं जा रहा

जब कोयंबतूर के पेड़ों को बरखा रानी ने भाग दिए
जब सारा जग जल दर्पण था वरनाची ने जंगल छोड़ा
जब इंद्रधनुष से रंग गिरे मधुबन मेघा में मुस्काया
जब स्वर्ण वर्ण चेहरे को सावन की बूंदों ने सहलाया
जब गीले सब्जे को चुंबन करते पैर अविरत चलते थे
तब दो चेहरे स्क्रीन पर एक दूजे से ख्वाब बदलते थे।
क्या बात मन में मौजों का शोर था और अंदर जन्मों के प्यासे थे
पर वीडियो कॉल पे क्या खुलता वो आंखें थी या कासे थे।
अभिलाषा थी कि फिर उस मूर्ति के दर्शन कब होंगे?
पुस्तक कब वेद में बदलेगी? मेरे गीत भजन कब होंगे?
अभिलाषा थी कि फिर उस मूर्ति के दर्शन कब होंगे?
पुस्तक कब वेद में बदलेगी? मेरे गीत भजन कब होंगे?
सपनों में ही मुमकिन था कि रूप स्वरूप बदल कर मिल लेता।
मैं कोई शोभदाबाज था कि बहरूप बदल कर मिल लेता।
फिर राहें बाहें खोलती हैं। मैं मंजिल पर जा पहुंचता हूं। एक

खस्ता नाव पे बहते-बहते साहिल पर जा पहुंचता हूं।
सागर से परे सेहराओं में एक जिस्म स्वागत करता है।
मुझे देखता है। मुझे चूमता है और मेरी तिलावत करता है।
वो पांच सुरों का राग था जो भादों में रात को गाते हैं।
साकार प्रेम था जिसकी पूजा मौसम करने आते हैं।
नैनों से बहती मदिरा को जब हंठों ने स्वीकार किया।
फिर से उस आग में जलने को मैंने खुद को तैयार किया।
पेड़ों पर पतझड़ भी नहीं थी और पत्ते भी झड़ जाते थे।
मैं अपने आप को छूता था और उस पे निशान पड़ जाते थे।
उन उंगलियों ने मेरी नस नस में जो आग भरी वो प्यारी थी।
आहें आकाश को छूती थी। यह कैसी शबेदारी थी।
सुंदरता के वितरण करते मेरी प्रेमिका जब सो जाती थी।
मंदिर में घंटियां बजती थी। मस्जिद में अज़ान हो जाती थी।
फिर यादों में चेहरों की परछाई अंकित हो जाती है।
एक शीश महल में शहजादी की अंगूठी खो जाती है।
तस्वीरें देखता हूं अब वो तस्वीर में कैसा लगता है
जैसे कोई कैदी से पूछे जंजीर में कैसा लगता?
कुछ तो सफेद शर्ट थी। तुम सीढ़ियों में बैठे थे।
मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए।
हमारी पहली मुलाकात याद है ना तुम्हें।
इशारे करते थे तुम मुझको आते जाते हुए।
तमाम रात वो आंखें ना भूलती थी मुझे कि
जिनमें मेरे लिए इज्जत और वकार दिखे।
मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर एक दिन
तुम्हें एक बार दिखे और बेशुमार दिखे।
मुझे यह डर था कि तुम भी कहीं वही तो नहीं
जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग छोड़ते हैं।
खुदा का शुक्र के तुम उनसे मुख्तलिफ निकले
जो फूल तोड़ के गुस्से में बाग छोड़ते हैं।
ज्यादा वक्त ना गुजरा था इस ताल्लुक को।
फिर उसके बाद वो लम्हा करी करी आया।
छुआ था तुमने मुझे और मुझे मोहब्बत पर
यकीन आया था। लेकिन कभी नहीं आया।
फिर उसके बाद मेरा नशा सकूद गया।
मैं कशमकश में थी। तुम मेरे कौन लगते हो?
मैं अमरेता तुम्हें सोचूं तो मेरे साहिर हो।
मैं फारेहा तुम्हें देखूं तो जॉन लगते हो।
हम एक साथ रहे हम एक साथ रहे
और हमें पता ना चला ताल्लुकात की हदबंदियां भी होती हैं।
मोहब्बतों के सफर में जो रास्ते हैं वही
हवस की समत में पगडंडियां भी होती हैं।
तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है ‘हाफी’।
तुम्हें मैं काश ये सब कुछ कभी बता पाती।
और अब मजीद ना मिलने की कोई वजह नहीं।
बस अपनी मां से मैं आंखें नहीं मिला पाती।

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